जैन मंदिर में मनाई गई वीर शासन जयंती -*
वैज्ञानिक संत आचार्य श्री निर्भय सागर जी के ससंघ सानिध्य में

*जैन मंदिर में मनाई गई वीर शासन जयंती -* वैज्ञानिक संत आचार्य श्री निर्भय सागर जी के ससंघ सानिध्य में भगवान महावीर स्वामी की वीर शासन जयंती बड़े उत्साह और भक्ति भाव से मनाई गई। सर्वप्रथम भगवान महावीर स्वामी की प्रतिमा का जलाभिषेक किया गया तदुपरांत शांति धारा पूजा चित्र अनावरण दीप प्रज्वलन करने का सौभाग्य अशोक कुमार अनुज कुमार राजा जैन एवं हीरालाल निमिष कुमार चातुर्मास समिति अध्यक्ष एवं समस्त कमेटी को यह सौभाग्य प्राप्त हुआ । इस अवसर पर आचार्य श्री ने वीर शासन जयंती पर प्रकाश डालते हुए कहा श्रवणवादी एकम को भगवान महावीर स्वामी की प्रथम दिव्या देशना समवशरण में दिव्यध्वनी के रूप में हुई थी। अतः आज के दिन से भगवान महावीर स्वामी का शासन काल प्रारंभ हुआ था। भगवान महावीर स्वामी ने शासन नहीं आत्म अनुशासन पर जोर दिया उन्होंने देश को नहीं अध्यात्म दृष्टि रखने वाले ज्ञानी पुरुषों  को अनुशासित किया। उन्होंने जियो और जीने दो , परमात्मा अंदर हमारी चेतन्य आत्मा में बैठा है लेकिन दुनिया इसी बाहर ढूंढ रही है। आत्मा स्वयं परमात्मा है। भगवान महावीर स्वामी की दिव्य ध्वनी ओमकार रूप में खीरी जो सब जीवो के कल्याणकारी थी। भगवान की दिव्या ध्वनी अनक्षरी भाषा में बादलों के गर्जना के समान होती है। उसे भाषा को गणधर स्वामी ही समझ पाते हैं। जैसे कंप्यूटर के माध्यम से एक ही भाषा को अनेक भाषाओं में परिवर्तित किया जा सकता है वैसे ही भगवान महावीर स्वामी की दिव्यधनी को देवों के द्वारा 18 महाभाषा और 700 लघु भाषा में स्वाभाविक परिणमन करने की क्षमता होती है लेकिन यह कार्य मगध जाति के देव करते हैं इसलिए भगवान महावीर स्वामी की अर्धमाघधि भाषा में हुई थी।