वैज्ञानिक सन्त आचार्य निर्भय सागर जी महाराज
*भोग नहीं, योग अपनाएं; गाय से सीखें मधुर वाणी और परोपकार का भाव : आचार्य निर्भयसागर* फिरोजाबाद
*भोग नहीं, योग अपनाएं; गाय से सीखें मधुर वाणी और परोपकार का भाव : आचार्य निर्भयसागर*
फिरोजाबाद । परम पूज्य वैज्ञानिक संत आचार्य श्री निर्भयसागर जी महाराज इन दिनों अपने संघ सहित छदामीलाल जैन मंदिर में विराजमान हैं। यहां प्रतिदिन प्रातः 8:30 बजे जीवनोपयोगी एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ओत-प्रोत प्रवचन हो रहे हैं, जिनमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित होकर धर्मलाभ प्राप्त कर रहे हैं।
आज की धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि मनुष्य को गाय से जीवन जीने की प्रेरणा लेनी चाहिए। गाय स्वयं रूखा-सूखा चारा खाकर भी संसार को अमृततुल्य मीठा दूध देती है। उसी प्रकार मनुष्य को भोजन चाहे जैसा मिले, किंतु उसकी वाणी सदैव मधुर, संयमित और हितकारी होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि गाय दिन में भोजन करती है और बार-बार जुगाली कर उसे पचाती है। इसी प्रकार मनुष्य को भी दिनभर ज्ञान, स्वाध्याय और सद्विचारों की जुगाली करनी चाहिए तथा गाली, कटु वचन और नकारात्मक सोच से दूर रहना चाहिए। गाय निस्वार्थ भाव से परोपकार करती है, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को भी समाजहित में जीवन जीना चाहिए।
आचार्य श्री ने कहा कि मानव शरीर स्वयं देवत्व का मंदिर है। हमारी आंखें सूर्य के समान प्रकाश देने का कार्य करती हैं, इसलिए उसमें सूर्य देवता का निवास है, हाथ भगवान विष्णु की तरह रक्षा और सेवा के साधन हैं, हृदय एवं मस्तिष्क भगवान गणेश की भांति विवेक और बुद्धि का संचालन करते हैं, मन ब्रह्मा की तरह नई-नई कल्पनाओं का सृजन करता है तथा नाक श्वास के माध्यम से वायु देवता का कार्य करती है। यदि मनुष्य अपने भीतर स्थित इन दिव्य शक्तियों को पहचान ले, तो उसका जीवन सार्थक बन सकता है।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को प्रातःकाल उठकर स्वयं को जागृत करने और परमात्मा की ओर बढ़ने का संकल्प लेना चाहिए। योग, प्राणायाम और सकारात्मक चिंतन से मन एवं शरीर दोनों ऊर्जावान बनते हैं। "यदि शरीर को स्वस्थ रखना है तो भोग नहीं, योग अपनाना होगा।"
आचार्य श्री ने जंक फूड से बचने की प्रेरणा देते हुए कहा कि असंतुलित खान-पान शरीर और मस्तिष्क दोनों को प्रभावित करता है। स्वस्थ एवं सुखी जीवन के लिए सात्विक भोजन और संयमित दिनचर्या आवश्यक है।
प्रवचन के समापन पर उन्होंने कहा कि जीवन में किसी का पर्दाफाश करने की अपेक्षा अपने व्यक्तित्व में पारदर्शिता लाने का प्रयास करना चाहिए। जब व्यक्ति स्वयं को जागृत कर लेता है, तभी उसका जीवन आत्मकल्याण और लोककल्याण की दिशा में अग्रसर होता है।